Tuesday, 17 May 2011




तुम्हारी कविता ....

तुम्हारी कविता ....
रवि कि रौशनी
आलोकित मुझे कर जाती है ,
तुम्हारी कविता ...
चंदा कि चांदनी
शीतल मुझे कर जाती है
तुम्हारी कविता .....
मदिर मे बजती मंगल ध्वनी,
पवित्र मुझे कर जाती है
तुम्हारी कविता ...
भावनाओ कि महक ,
सुगन्धित मुझे कर जाती है
तुम्हारी कविता ...
पछियों कि मधुर ध्वनी,
आनंदित मुझे कर जाती है .

Tuesday, 26 April 2011


इंतजार ...

उस अजनबी के
इंतजार मे
बह गया नैनो से
मेरा काजल...
बैठी रहती हू
देहरी पर
उसके आने कि
बाट जोहती ....
भोर से साँझ तक
राह तकती ....
रोज़ जलाती दिया
उसके नाम का...
कि शायद वो अजनबी
दिए के उजाले में ....
अपने कदमो के निसा
ढूँढते हुए वापिस आ जाये
और मेरा इंतजार
ख़त्म हो ....

Monday, 25 April 2011





सोचती हूं ये जीवन भी क्या है?
अजीब पहेली कभी लगे सहेली.
कभी अठखेली, अनसुलझी अकेली
कभी पटरी पर चलती रेल
कभी हंसी कभी खेल.
कभी कसैला जैसा करेला
कभी लगता पल पल विषैला।
भावों की परत दर परत
अनजानी, कम ही पहचानी
अपनों का संग
जैसा खिलता वसंत
भावों की पगड़ंडी जिसमें
हंसी, ठिठौली, मिलन
और कभी-कभी ओजमय रंगत।
धूप कभी छांव शहर कभी गांव
बेतरतीब राहों पर अनजाना सफर
दर्द और दु:ख कभी मीठा कभी जहर
जीवन की अठखेली और पहेली
जीवन अजीब सी दास्तां
जीवन की डगर बहुत ही विकट
जो लगता दूर वो होता निकट
जो होता पास वह सिर्फ अहसास
कैसी ये जीवन की पाती
न समझे तुम,
न मुझे समझ आती.
जी रहे हैं हम तुम
बस अपनी अपनी भांति।। ...)



अमराई ने ली अंगड़ाई
बौर खिली अरू अमियां आई
कोयल सुन्दर गीत सुनाती
सबके मन को है अति भाती।
चहुं दिश फूल खिले हैं न्यारे
धरती अम्बर लगते प्यारे
नदिया गाती पर्वत गाते
वन उपवन सबको हर्षाते।
खेतों में गेहूं की बाली
बगिया को सींचे है माली
वैशाखी के गीत सुनाकर
फसल काटते है मतवाले।
रंग बिरंगी अपनी धरती
भांति-भांति के पुष्प् निराले
बोली-भाषा रीति भिन्न है
लेकिन फिर भी एक हैं सारे।। ...)


वो....

वो फुटपाथ पर बैठी

फटे हाल रहकर भी
जीती है असीम संतोष
और धीरज के साथ.
ये फुटपाथ ही उसका घर
यही उसका संसार फिर भी
किसी से गिला ना शिकवा
दुःख सहना उसका नसीब
बेचारी लाचार और मजबूर.
बचपन उसका कुम्लाया
धूप, गर्मी में हुलसाया
अभाव में बिता यौवन
जीवन जैसे है बस पतझर .
अपने आंसू पी जाती है
बेटी को का मुख देख बेचारी
पल पल देखो है घबराती
कैसे बेटी को वो पाले..?
तन को वसन ना सूखी रोटी
दिन दिन रहती भूखी बेटी.
देह तपी और जी हुलसाया
एक दिन तब ऐसा भी आया
बस बेटी को सौंप ठिकाना
वक्त से पहले हुई रवाना.
हाय ! विधाता तेरी लीला
कैसे दिन काटेगी सुशीला
बिन माँ की ये बेटी कैसे
चौराहे में रह पायेगी ..?
पग पग में है छल छलवा
कैसे ये अब ये दिन काटेगी .?
हाय बिधाता तेरी लीला
कैसे अबला जी पायेगी...??




भोर सुहानी...

जब रोज सुबह पेड़ पर
कोयल है आवाज लगाती
जैसे कहती जागो, जागो
आई भोर आई सुहानी.
सूर्य किरण खिड़की से झांकती
मंद पवन हौले से मुस्काती
तन को होले से छू जाती
कहती जागो आलस त्यागो.
कल कल करती गंगा मइया
मधुर मधुर संगीत सुनाती,
बारिस के मौसम में रिमझिम
बूंदे मेरा मन हरसाती,
मिटटी की वो सौंधी खुसबू
आज भी तन मन बसी हुई है
बहुत याद आती है मुझको
अपने गांव की भोर सुहानी |

Saturday, 23 April 2011


शिव भोले नाथ आओं ...

शिव भोले नाथ आओं
करु तुम्हारा अभिनन्दन
लगाऊं तुम्हे मै
अक्षत चन्दन
तुम ही शिव,तुम ही सत्य
मेरे शिव भोले नाथ
प्रेम तुम्हारा
जगा रहे दिन रात
वारु सब कुछ
तुमपर सदा मेरे भोले नाथ

दूध फूल पुष्प चढ़ाऊ
हे कैलाशपति मुरारी
उमापति त्रिपुरारी
सबके दुःख हो कम
ख़ुशी होए हरदम
मानवता के लिए
करू मै कामना,
बढे परस्पर प्रेम
सहयोग की भावना,
स्वभाव मे हो इतनी शीतलता
क्रोध कि अग्नि जलने न पाए
अंतर्मन रहे निष्कपट, निश्छल, 

सत्य केवल सत्य का ही
जाप करू मै'अंतर्यामी
तुम ही भोले तुम ही
बागम्बर मेरे स्वामी,
मै मै" न रहू तुम' हो जाऊ
तुमसे मिलकर
शिव भोले नाथ आओं
करु तुम्हारा अभिनन्दन
लगाऊं तुम्हे मै
अक्षत चन्दन|