Friday, 1 April 2011

  मेरे भाव.......
अचानक उठती 

कागज कलम ढूँढती  और
कुछ शब्दों को आकार देती
तब जाकर कुछ कहती।
मन में उठते अनेकों भाव
पल-पल बदलता विचारों का प्रवाह
क्या-क्या उर में भाव जगे
कुछ लिख जाती कुछ रह जाते।
सोच रही मैं भी भाव तो हूं
बस बनकर इक भाव अधूरा।
सबमें न जाने कहां खो गये।
मैं भी मेरी कविता की मानिंद
पंक्ति सधी थी जीवनपथ पर
बढ़ी मगर कुछ गढ़ न सकी
अपने सपनों की कविता सम
जो छूट गई बिन लिखी कहीं।
फिर मन कहता कुछ नहीं हुआ
अपनों का संग और अपनाघर
उनकी खातिर किया सर्मपण।
लेकिन मेरे भाव जगे हैं
मेरी कलम मेरी रचना मे
लिखकर कहकर भावों में
जो आता है लिख लेती हूं
जीवन उपवन महक रहा है।
ये क्या कम मेरे जीवन में..
अपने उर अपने सपनों को
भाव रंगों का मैं ही भरूंगी।
अर्ध राह में बिन आकार के
अब कविता न मरने दूंगी।
लिखकर अपने भाव कहूँगी
मैं अपना अब अर्थ गढ़ूंगी|



तुम कहते हो!
मुझे सहेजना  संवारना
जोड़ना, संभालना
अच्छी तरह से आता है.
तभी तो हरदम
तुम्हारे, मेरे संबंधों को
रिश्तों की ड़ोर को
अपने परायों को
रिश्तों के भावों को
हर हाल में संभाल कर रखा है.
मेरी हर कोशिश रही
की हमारा घर संसार
अपनों का स्नेह और प्यार
कभी ना कम हो ना कभी
किसी प्रकार टूटन हो.
इसके लिए मैंने चाहे
अपने जीवन, अपने स्वत्व और
सपनों को मिटा दिया.
हां सच है ये...!

जीवन 


नदी किनारे अचानक
मन में ख्याल आया
जीवन भी तो नदी की
मानिंद ही चलायमान
निर्बाध और निरंतरता
लिए चला जा रहा  है
देखो ना..! पल, पल
दिन गुजरते जा रहे
कब बचपन गया..
कब जवानी आई और
देखो तो तनिक देह को
गौर करो तो तुम्हे भी
मेरी तरह महसूस होगा
आगाज बुढ़ापे का हौले ही
सही पर अगर ईमानदारी
और निश्चलता से देखोगे तो
समझ जाओगे की समय
किस गति से गुजर रहा  है
अपने निशान कुछ समेटे और
कुछ छोडकर अहसास करता
कल आज और कल का
जीवन की नश्वरता और
पल पल का.
ये अलग बात है की
हम इसे जानकर भी
स्वीकार नहीं करते.

                                                                प्यारी सी चिड़िया ...
                                              



एक प्यारी सी नटखट सी चंचल सी चिड़िया, 
न जाने कहाँ से आई ये चिड़िया!.

न कोई ठिकाना न संगी न साथी

फिर भी बेफिक्री में जीती ये चिड़िया,

गीत गुनगुनाती, ये गाती है चिड़िया.



घरोदे से उड़कर दाने को जाती

दिनभर यूँ उड़ती है, बेफिक्र रहती

उड़ना नियति उसकी घरोंदा है मंजिल

दिनभर उड़कर ये दाना जो लाती

ये सी  न्यारी चिड़िया, ये प्यारी सी  चिड़िया.



चिड़िया सिखाती हमको भी जीना

हर हाल में सबसे मिलकर के रहना

कितना भी रूठे अपनों से हम

फिर भी तो घरबार मंजिल  है अपनी,

देती संदेशा ये प्यारी सी चिड़िया.


जाने कहाँ  से आई ये चिड़िया

देखो तो इसको समझो तो इसको

न कोई लालच न कोई भण्डार  

फिकर आज की ना, न चिंता है कल की

जीती अभी में ये प्यारी सी  चिड़िया.



इसे छोड़ जाना है, ये घर ये घरोंदा

अपनों की खातिर ये खपती ये चिड़िया

हर हल में खुश रहो, कहती ये चिड़िया

जीवन है चलना सिखाती है चिड़िया,

कितनी है भोली है ये प्यारी  सी चिड़िया.
मौत से सामना.....


डॉक्टर ने कह दिया, अब न ये बचेगी
जीवन डोर न अब खीच सकेगी
सुनकर सब हतप्रभ,ग़मगीन चहुँ ओर
मेरे उर कि आशा में बनी रही एक ड़ोर.
सलाह दर सलाह मशविरा सभी का
पल-छिन, दिन बस इतना ही जीवन इसका,
एक पल मैं अन्दर से हिल सी गयी
जब मौत कि आहट मेरे कानो मे पड़ी.
आभास हुआ अब न मैं जी पाऊँगी
अपने नौनिहाल अपनों को अधर मे छोड़ जाउंगी
बेटे कि याद ने अन्दर तक कचोटा
अनिश्चित भय ने मेरा रोम रोम झझकोरा
अपने पराये सब बिस्मित हो निहारते
अब चंद घड़ी कि मेहमां जान दुलारते,
मेरे अंतस मे एक जिज्ञासा बलवती हुई
मौत केसे आती है जानने कि चाह बढ़ी.
कैसे आएगी मौत लेने क्या कहेगी...
जब आएगी तो क्या झपट जीवन लेगी?
पर्दा हिलता या खट सी आवाज होती
मौत कि आहट है ये समझती.
अपनों की लाचारी दुःख कि ये आपार घड़ी
मेरे उर मे जिज्ञासा भविष्य कि बढ़ी
ब्यक्त में मैं खुश सी दिखती
खबर मौत की पा जरा भी ना डोली.
लोग सोचते पागल सदमे से होली
भय मौत का सुन मति इसकी पलटी
समय जैसे-जैसे बीत रहा था
दिल में जीने की ख्वाहिश की बढती.
एक औरत फरियाद कुरान की आयतें
सुफल हो गई जान मेरी बचा के
उसने दुलारा दिया था सहारा
बचेगी तू सच में जरा ना घबराना.
बहुत कुछ गवां कर ये जीवन था पाया
जन्म जैसे मेरा हुआ था दुबारा
साक्षात् मौत से हुआ था हमारा
जो सोचा नहीं था वो अनुभव हुआ था...


ऐ वक्त 



ऐ वक़्त मुझे न रोकना
मैं तुम्हारे साथ आ रही हूँ.
ऐ वक़्त मुझे न समझना
मैं तुम्हे समझ रही हूँ.
ऐ वक़्त मुझे न छोड़ना
मै चलने कि कोशिश कर रही हूँ.
ऐ वक़्त मुझे न रुलाना
मै हंसने कि कोशिश कर रही हूँ.
ऐ वक़्त मुझे वक़्त देना
मै अपने आप को बदल रही हूँ.
ऐ वक़्त मेरे साथ रहना
मै तुम्हारे साथ ही आ रही हूँ.
ऐ वक्त जरा ठहरना
मैं कुछ तलाश रही हूँ.
ऐ वक्त जरा रुकना
मैं जरा थक सी  गयी हूँ.
ऐ वक्त जरा पढ़ना
मैं कुछ लिखने लगी हूँ.
ऐ वक्त जरा चुप रहना
मैं जरा कहने लगी हूँ.
ऐ वक्त कभी संभलो
मैं बिखरने लगी हूँ.
कभी मेरी भी सुनना
हरदम तुम्हारी सुनती हूँ
कभी समय दो कभी रुको
जरा कुछ रचने बसने लगी हूँ.
समय



समय
कब कैसे बीता पता ही न चला
लगता है जैसे कल ही की बात है
जब बच्ची थी, स्कूल जाती थी
माँ पिता  के गले लगकर
बहुत नाज नखरे करती थी..
समय पंख लगाकर उड़ता गया
और मेरा बचपन पीछे छूट गया
जीवन की डगर में आगे बढती रही
लेकिन मेरे कुछ अपने कुछ सपने
पीछे रह गये अधूरी आस की भांति.
कब सयानी हुई, कब शादी हो गयी
बेटी से बहू और बहू से माँ बन गई
संबंधो की ड़ोर में बंधती गई इस तरह
अपने लिए तो समय ही नहीं रहा
मेरे कुछ सपने थे जिंदगी में कभी
इस भागम भाग में कहाँ गुम गये..?
समय से बहुत कुछ पाया है मैंने
बहुत कुछ खो भी गया इसे दौड़ में...